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कैलाश परिक्रमा 2026: 12 वर्षों में एक बार आने वाला अश्व वर्ष का विशेष महत्व

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कैलाश परिक्रमा 2026: 12 वर्षों में एक बार आने वाला अश्व वर्ष का विशेष महत्व

तिब्बती पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 अश्व वर्ष (Horse Year) है। यह कोई सामान्य वर्ष नहीं — यह हर बारह वर्षों में एक बार आने वाला वह दुर्लभ संयोग है जब भगवान शिव के निवास स्थान कैलाश पर्वत की एक परिक्रमा का पुण्य सामान्य वर्षों की तेरह परिक्रमाओं के बराबर होता है। हिंदू धर्म में जहाँ एकादशी, पूर्णिमा और सावन मास का विशेष महत्व है, वहीं तिब्बती परंपरा में अश्व वर्ष को कैलाश दर्शन और परिक्रमा के लिए सर्वश्रेष्ठ काल माना गया है। यह लेख इसी अद्भुत संयोग के आध्यात्मिक, ज्योतिषीय और व्यावहारिक आयामों पर प्रकाश डालता है।

अश्व वर्ष: क्या है यह और क्यों है इतना विशेष?

तिब्बती पंचांग और अश्व वर्ष की उत्पत्ति

तिब्बती कैलेंडर, जो भारतीय कालचक्र तंत्र पर आधारित है, बारह पशु राशियों (मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ, मीन — जो तिब्बती परंपरा में क्रमशः चूहा, बैल, बाघ, खरगोश, ड्रैगन, साँप, घोड़ा, भेड़, बंदर, मुर्गा, कुत्ता और सूअर के रूप में हैं) और पाँच तत्वों (लकड़ी, अग्नि, पृथ्वी, लोहा, जल) के संयोग से साठ वर्षों का एक पूर्ण चक्र बनाता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे हिंदू पंचांग में संवत्सरों का साठ वर्षीय चक्र होता है — प्रभव से लेकर क्षय तक।

2026 तिब्बती पंचांग का ‘अग्नि अश्व वर्ष’ (Fire Horse Year) है। तिब्बती मान्यता के अनुसार, भगवान बुद्ध का जन्म अश्व वर्ष में हुआ था — ठीक वैसे ही जैसे हिंदू धर्म में भगवान श्रीराम का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी को और श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को हुआ था। जिस प्रकार रामनवमी और जन्माष्टमी के दिन पूजा-अर्चना का विशेष फल होता है, उसी प्रकार बुद्ध के जन्म वर्ष में उनसे संबंधित पवित्र स्थलों — और विशेषकर कैलाश पर्वत — की यात्रा असीम पुण्य प्रदान करती है।

अश्व: हिंदू धर्म में घोड़े का प्रतीकात्मक महत्व

यह संयोग और भी रोचक हो जाता है जब हम देखते हैं कि हिंदू धर्म में भी अश्व (घोड़ा) का अत्यंत गहरा आध्यात्मिक महत्व है:

  • अश्वमेध यज्ञ: प्राचीन भारत का सर्वोच्च यज्ञ, जो केवल चक्रवर्ती सम्राट ही कर सकते थे। यह यज्ञ साम्राज्य विस्तार, समृद्धि और मोक्ष प्राप्ति का प्रतीक था।
  • सूर्य देव का रथ: भगवान सूर्य का रथ सात अश्वों द्वारा खींचा जाता है, जो सात दिनों, सात रंगों और सात लोकों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • कल्कि अवतार: भगवान विष्णु का दसवाँ और अंतिम अवतार कल्कि एक श्वेत अश्व पर सवार होकर आएंगे, जो अधर्म के अंत और सत्ययुग के आरंभ का प्रतीक होगा।
  • हयग्रीव: भगवान विष्णु का अश्व-मुख अवतार, जिन्होंने वेदों की रक्षा की और ज्ञान का प्रसार किया।

इस प्रकार, अश्व वर्ष में कैलाश की परिक्रमा केवल तिब्बती परंपरा का ही नहीं, अपितु हिंदू आस्था के अश्व-प्रतीकवाद से भी जुड़ा हुआ एक दिव्य संयोग है।

तेरह गुना पुण्य: आध्यात्मिक गणित को समझें

एक परिक्रमा, तेरह का फल

तिब्बती परंपरा में यह मान्यता सदियों से चली आ रही है कि अश्व वर्ष में की गई कैलाश की एक परिक्रमा (कोरा) का पुण्य सामान्य वर्षों की तेरह परिक्रमाओं के बराबर होता है। हिंदू धर्म में पुण्य की अवधारणा को समझने वाले हर भक्त के लिए यह अत्यंत आकर्षक है। प्रश्न उठता है: तेरह ही क्यों?

तेरह का रहस्य: तिब्बती और हिंदू दृष्टिकोण

तिब्बती दृष्टिकोण: तिब्बती बौद्ध धर्म में बारह ‘निदान’ (प्रतीत्यसमुत्पाद के बारह कारण) हैं जो जन्म-मरण के चक्र का निर्माण करते हैं। तेरहवाँ इन बारह बंधनों से मुक्ति का प्रतीक है — मोक्ष या निर्वाण की प्राप्ति। अश्व वर्ष की एक परिक्रमा उस तेरहवें बिंदु को स्पर्श करती है जो जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाती है।

हिंदू दृष्टिकोण: हिंदू धर्म में भी तेरह का विशेष महत्व है:

  • त्रयोदशी: प्रत्येक मास की त्रयोदशी तिथि शिव पूजन के लिए विशेष मानी जाती है। काशी में त्रयोदशी का स्नान और शिव दर्शन मोक्षदायी कहा गया है।
  • तेरह संस्कार: हिंदू जीवन के तेरह प्रमुख संस्कार (गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक)।
  • महाशिवरात्रि: फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी — अर्थात तेरहवीं तिथि — को मनाया जाने वाला शिव का सबसे बड़ा पर्व।

इस प्रकार, हिंदू भक्त के लिए तेरह गुना पुण्य की अवधारणा कोई विदेशी या अपरिचित विचार नहीं है। यह भारतीय आध्यात्मिक गणना में सहज रूप से समाहित है।

पुण्य गुणक: क्या कहता है आपका कर्म खाता?

इसे ऐसे समझें: जैसे बैंक में सावधि जमा (FD) पर चक्रवृद्धि ब्याज मिलता है, और जैसे श्रावण मास में किए गए शिवाभिषेक का फल सामान्य दिनों से कई गुना अधिक होता है, वैसे ही अश्व वर्ष में की गई कैलाश परिक्रमा आपके आध्यात्मिक ‘कर्म खाते’ में तेरह गुना पुण्य जमा करती है। जो लोग आयु, स्वास्थ्य या साधनों की सीमा के कारण बार-बार कैलाश नहीं जा सकते, उनके लिए यह एक जीवन का अवसर है।

शिव भक्तों के लिए अश्व वर्ष का महत्व

कैलाश: शिव का चिरंतन धाम

पुराणों में स्पष्ट वर्णन है — “कैलासे धवलोदये” — भगवान शिव का निवास कैलाश पर्वत पर है। शिव पुराण, स्कंद पुराण और लिंग पुराण में कैलाश को शिव का साक्षात स्वरूप बताया गया है। हिंदू भक्त के लिए कैलाश दर्शन केवल एक भौगोलिक यात्रा नहीं; यह शिव के सान्निध्य में प्रवेश है।

अश्व वर्ष 2026 में जब आप कैलाश की परिक्रमा करते हैं, तो तिब्बती परंपरा का तेरह गुना पुण्य का आशीर्वाद आपको प्राप्त होता ही है, साथ ही हिंदू आस्था के अनुसार शिव का विशेष आशीर्वाद भी। यह एक ऐसा दुर्लभ संगम है जहाँ दो महान आध्यात्मिक परंपराएँ — बौद्ध और हिंदू — एक ही दिशा में संकेत करती हैं।

2026 में शिव-विशेष तिथियाँ और अश्व वर्ष का संयोग

2026 में कई हिंदू तिथियाँ अश्व वर्ष के पुण्य प्रभाव को और भी बढ़ा देती हैं:

हिंदू तिथिअनुमानित तारीख (2026)महत्व
महाशिवरात्रिफरवरी मध्यशिव का सर्वप्रमुख व्रत
श्रावण मास आरंभजुलाई मध्यशिव उपासना का पवित्र मास
श्रावण सोमवारजुलाई-अगस्तप्रति सोमवार विशेष शिव पूजन
श्रावण पूर्णिमाअगस्त मध्यपवित्र स्नान और दान का दिन
सागा दावा (बौद्ध)जून मध्यकैलाश क्षेत्र का सर्वाधिक पवित्र दिन

विशेष मुहूर्त: यदि आप 2026 में कैलाश यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) का समय सबसे श्रेष्ठ मुहूर्त है। इस दौरान एक ओर तिब्बती पंचांग का अश्व वर्ष सक्रिय है, तो दूसरी ओर हिंदू पंचांग का शिव-समर्पित श्रावण मास। श्रावण के सोमवार को कैलाश दर्शन — इससे बड़ा संयोग शायद ही कोई हो सकता है।

हिंदू ज्योतिष और अश्व वर्ष का संबंध

मुहूर्त की दृष्टि से 2026

हिंदू ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यात्रा का मुहूर्त अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। ‘प्रस्थान त्रिकोण’ नामक ग्रंथ में यात्रा-मुहूर्त का विस्तृत विवरण मिलता है। शुभ ग्रहों की स्थिति, तिथि-वार-नक्षत्र का संयोग और व्यक्तिगत राशि के अनुसार यात्रा का फल निर्धारित होता है।

2026 में अश्व वर्ष को हिंदू ज्योतिषीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो:

  • राशि परिवर्तन: तिब्बती पंचांग का अश्व वर्ष, हिंदू ज्योतिष की धनु राशि (जिसका चिह्न अश्व है) से जुड़ता है। धनु राशि गुरु ग्रह की राशि है, और गुरु ज्ञान, धर्म और आध्यात्मिकता का कारक ग्रह है।
  • गुरु का प्रभाव: हिंदू धर्म में बृहस्पति (गुरु) को देवताओं का गुरु माना जाता है। गुरु की अनुकूल स्थिति में की गई तीर्थ यात्रा अत्यधिक फलदायी होती है।
  • सूर्य का अश्व संबंध: सूर्य सात अश्वों पर सवार होकर संसार को प्रकाशित करते हैं। अश्व वर्ष में सूर्य की उपासना और शिव (जो सूर्य के भी आराध्य हैं) की परिक्रमा का विशेष संयोग बनता है।

अश्व वर्ष 2026 बनाम पिछला अश्व वर्ष 2014

2014 का अश्व वर्ष ‘काष्ठ अश्व वर्ष’ (Wood Horse Year) था। 2026 ‘अग्नि अश्व वर्ष’ है। हिंदू ज्योतिष के अनुसार, अग्नि तत्व ऊर्जा, परिवर्तन और शुद्धिकरण का प्रतीक है। अग्नि सभी दोषों को भस्म कर देती है — जैसे शिव की तीसरी आँख से निकली अग्नि ने कामदेव को भस्म कर दिया था। अतः अग्नि अश्व वर्ष 2026 की परिक्रमा, काष्ठ अश्व वर्ष 2014 की तुलना में और भी शक्तिशाली मानी जा सकती है — यह पापों के दहन और आध्यात्मिक रूपांतरण के लिए विशेष रूप से प्रभावी है।

2026 में भारतीय तीर्थयात्रियों की संभावित भीड़

2014 का अनुभव और 2026 का अनुमान

2014 के पिछले अश्व वर्ष में कैलाश क्षेत्र ने लगभग 80,000 से 1,00,000 तीर्थयात्रियों का स्वागत किया था — जिनमें भारत, नेपाल, भूटान और तिब्बत के श्रद्धालु शामिल थे। भारतीय तीर्थयात्रियों की संख्या अकेले 10,000-15,000 के आसपास थी।

2026 के अश्व वर्ष में ये आँकड़े काफी बढ़ने की संभावना है। कारण:

  1. बेहतर यातायात: 2014 की तुलना में अब लिपुलेख दर्रे की सड़क बेहतर हो गई है और नाथू ला मार्ग अधिक स्थापित हो चुका है।
  2. सूचना क्रांति: सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्मों के माध्यम से अश्व वर्ष के महत्व की जानकारी अब करोड़ों भारतीयों तक पहुँच रही है।
  3. कोरोना-पश्चात आध्यात्मिक जागृति: वैश्विक महामारी के बाद लोगों में आध्यात्मिकता और तीर्थाटन के प्रति रुझान बढ़ा है।
  4. आर्थिक समृद्धि: भारत में मध्यम वर्ग की बढ़ती आय ने कैलाश जैसी महँगी यात्राओं को अधिक लोगों की पहुँच में ला दिया है।

अनुमानित आँकड़ा: 2026 में केवल भारत से 20,000 से 30,000 तीर्थयात्री कैलाश पहुँच सकते हैं। कुल तीर्थयात्रियों की संख्या 1,50,000 को पार कर सकती है।

तारचेन और मार्ग पर भीड़ का प्रभाव

तारचेन (दारचेन) — कैलाश परिक्रमा का प्रारंभिक बिंदु — की सामान्य आवास क्षमता लगभग 2,000 लोगों की है। अश्व वर्ष के व्यस्ततम समय (जून-अगस्त) में यहाँ एक साथ 5,000 से 8,000 लोग उपस्थित हो सकते हैं। डिरापुक मठ और ज़ुतुलपुक मठ के अतिथि गृहों में भी जगह मिलना लगभग असंभव हो जाता है।

सुझाव:

  • कम से कम 3-4 महीने पहले यात्रा बुक करें।
  • तंबू और शून्य-डिग्री स्लीपिंग बैग साथ लेकर चलें।
  • सागा दावा (जून मध्य) के एक सप्ताह के आसपास यात्रा करने से बचें — यह सबसे अधिक भीड़ का समय होता है।
  • सितंबर-अक्टूबर की अपेक्षाकृत कम भीड़ वाली अवधि पर विचार करें।

भारत सरकार की कैलाश यात्रा: अश्व वर्ष में अनुमति

लिपुलेख दर्रा मार्ग (MEA यात्रा)

भारत सरकार के विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा संचालित कैलाश मानसरोवर यात्रा, लिपुलेख दर्रे से होकर जाती है। सामान्य वर्षों में इस यात्रा में लगभग 200-300 सीटें होती हैं जो लॉटरी प्रणाली से भरी जाती हैं।

अश्व वर्ष में क्या बदलेगा: अश्व वर्ष के महत्व को देखते हुए सरकार सीटों की संख्या बढ़ा सकती है, लेकिन आवेदनों की संख्या कई गुना बढ़ जाएगी। यदि सामान्य वर्ष में 2,000-3,000 आवेदन आते हैं, तो अश्व वर्ष में यह संख्या 15,000-20,000 तक पहुँच सकती है। लॉटरी में चयन की संभावना अत्यंत कम होगी।

नाथू ला मार्ग (सिक्किम) और नेपाल मार्ग

जो लोग सरकारी लॉटरी पर निर्भर नहीं रहना चाहते, उनके लिए प्राइवेट टूर ऑपरेटरों के माध्यम से नाथू ला (सिक्किम) और नेपाल मार्ग उपलब्ध हैं। अश्व वर्ष में इन मार्गों पर माँग बहुत बढ़ जाएगी:

  • लागत वृद्धि: सामान्य वर्षों की तुलना में 30-50% तक अधिक खर्च हो सकता है।
  • अग्रिम बुकिंग: जनवरी-फरवरी 2026 तक बुकिंग करा लेना सुरक्षित रहेगा।
  • समूह यात्रा: समूह में यात्रा करने से लागत कम होती है और स्लॉट मिलने की संभावना बढ़ती है।

महत्वपूर्ण दस्तावेज़ पहले से तैयार रखें

अश्व वर्ष में दस्तावेज़ प्रक्रिया में भी देरी हो सकती है। सुनिश्चित करें:

  • पासपोर्ट: कम से कम 6 महीने की वैधता शेष (दिसंबर 2025 तक नवीनीकरण करा लें)।
  • चिकित्सा प्रमाणपत्र: यात्रा से 2-3 महीने पहले प्राप्त कर लें।
  • ट्रैवल इंश्योरेंस: उच्च ऊँचाई वाली यात्रा के लिए विशेष बीमा अवश्य कराएँ।
  • वीज़ा और परमिट: अपने टूर ऑपरेटर के माध्यम से समय पर प्रक्रिया शुरू करें।

2026 की प्रमुख तिथियाँ और शुभ मुहूर्त

तिब्बती पंचांग के अनुसार

समयावधिघटनाविवरण
अप्रैल 2026 मध्यपरिक्रमा मार्ग खुलनाहिमपात की स्थिति पर निर्भर
जून 2026 मध्यसागा दावा महोत्सवसर्वाधिक भीड़; बुद्ध जयंती, बोधि और निर्वाण दिवस
जुलाई-अगस्त 2026चरम मौसमसबसे व्यस्त; भारी वर्षा संभव
सितंबर-अक्टूबर 2026स्वर्णिम कालसर्वोत्तम मौसम; अपेक्षाकृत कम भीड़
अक्टूबर 2026 अंतमार्ग बंदीमौसम अनुसार परिवर्तनशील

हिंदू पंचांग के शुभ मुहूर्त

हिंदू तिथि2026 में संभावित समयकैलाश यात्रा के लिए महत्व
महाशिवरात्रिफरवरी 2026यात्रा संकल्प लेने का सर्वोत्तम दिन
अक्षय तृतीयाअप्रैल-मई 2026अक्षय पुण्य की तिथि
श्रावण मासजुलाई-अगस्त 2026शिव उपासना और परिक्रमा का श्रेष्ठ मास
श्रावण सोमवारजुलाई-अगस्त 2026 (प्रति सोमवार)कैलाश दर्शन का परम मुहूर्त
भाद्रपद पूर्णिमासितंबर 2026पितृ तर्पण और तीर्थ यात्रा के लिए शुभ
कार्तिक पूर्णिमानवंबर 2026देव दीपावली; यात्रा समापन का शुभ समय

हमारी अनुशंसा: यदि संभव हो, तो श्रावण मास के किसी सोमवार के आसपास परिक्रमा का समय निर्धारित करें। यदि श्रावण में न जा सकें, तो सितंबर का प्रारंभिक पक्ष — भाद्रपद शुक्ल पक्ष — भी अत्यंत शुभ है और मौसम की दृष्टि से सर्वोत्तम।

अश्व वर्ष परिक्रमा: विशेष व्यावहारिक तैयारी

आवास की चुनौती और समाधान

अश्व वर्ष में तारचेन और परिक्रमा मार्ग पर आवास की भारी कमी होगी। तैयारी इस प्रकार करें:

  • चार मौसमों का तंबू: -15°C तक तापमान सहन करने में सक्षम।
  • डाउन स्लीपिंग बैग: -10°C से -15°C रेटिंग का।
  • पोर्टेबल स्टोव और ईंधन: गर्म पानी और भोजन के लिए।
  • तारचेन में आवास: यात्रा से 3-4 माह पूर्व बुक करें।
  • संगठित समूह को प्राथमिकता दें: समूह यात्राओं में आवास पहले से सुरक्षित होता है।

खाद्य सामग्री और आपूर्ति

परिक्रमा मार्ग पर स्थित छोटी दुकानों में सामान्य दिनों में भी सामग्री सीमित होती है। अश्व वर्ष में आवश्यक वस्तुएँ समाप्त हो सकती हैं:

  • शिमला या दिल्ली से ही 3-4 दिन का सूखा भोजन लेकर चलें।
  • एनर्जी बार, ड्राई फ्रूट्स, गुड़-चना, भुने मखाने, चॉकलेट और ग्लूकोज़ पाउडर अनिवार्य रूप से रखें।
  • ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्ट (ORS) और इलेक्ट्रोलाइट पाउडर की पर्याप्त मात्रा ले जाएँ।
  • पानी शुद्ध करने की टैबलेट या पोर्टेबल फ़िल्टर अवश्य रखें।

वाहन बुकिंग

दिल्ली/काठमांडू से तिब्बत सीमा तक के वाहन अश्व वर्ष में पहले से बुक हो जाते हैं। किराया सामान्य से 40-60% तक बढ़ सकता है। यदि प्राइवेट टूर ऑपरेटर के बिना जा रहे हैं, तो दिसंबर 2025-जनवरी 2026 तक वाहन बुकिंग सुनिश्चित कर लें।

परिक्रमा का आध्यात्मिक स्वरूप

बाह्य परिक्रमा और आंतरिक परिक्रमा

कैलाश की मुख्य परिक्रमा (बाह्य कोरा) 52 किलोमीटर की है, जो 3 दिनों में पूरी की जाती है। परंपरा के अनुसार, 13 बाह्य परिक्रमाएँ पूर्ण करने के बाद ही आंतरिक परिक्रमा (नंगी कोरा) का अधिकार मिलता है — जो पर्वत के अत्यंत निकट से होकर गुज़रती है।

अश्व वर्ष में एक बाह्य परिक्रमा तेरह के बराबर मानी जाने के कारण, कई श्रद्धालु बाह्य परिक्रमा पूर्ण करने के पश्चात सीधे आंतरिक परिक्रमा का प्रयास करते हैं। किंतु सावधान रहें — आंतरिक परिक्रमा अत्यधिक कठिन है और इसके लिए अनुभवी गाइड अनिवार्य है।

दंडवत परिक्रमा

सर्वाधिक कठोर और पुण्यदायी विधि है ‘दंडवत परिक्रमा’ — अर्थात प्रत्येक कदम पर पूर्ण शरीर भूमि पर लेटकर दंडवत प्रणाम करते हुए 52 किलोमीटर की संपूर्ण परिक्रमा। इसमें 15-20 दिन लगते हैं। हिंदू धर्म में इसे ‘अष्टांग प्रणाम’ या ‘साष्टांग दंडवत’ कहा जाता है — यह परम समर्पण और शरणागति का प्रतीक है।

अश्व वर्ष में दंडवत परिक्रमा का पुण्य अकथनीय माना गया है। जो श्रद्धालु शारीरिक रूप से सक्षम हैं और पूर्ण आत्मसमर्पण की भावना रखते हैं, उनके लिए यह एक अविस्मरणीय आध्यात्मिक अनुभव होगा।

शिव स्मरण और मंत्र जाप

परिक्रमा के दौरान भगवान शिव का स्मरण अनवरत करें। ‘ॐ नमः शिवाय’ पंचाक्षरी मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र (‘ॐ त्र्यम्बकं यजामहे…’), या शिव तांडव स्तोत्र का मानसिक जाप करते हुए चलें। जब आप डोल्मा ला दर्रे (5,648 मीटर) पर पहुँचें, तो वहाँ शिव को समर्पित एक दीप प्रज्वलित करें — यह क्षण आपके जीवन का सर्वाधिक आध्यात्मिक अनुभव होगा।

निष्कर्ष: बारह वर्ष की प्रतीक्षा, एक जीवन का अवसर

पिछला अश्व वर्ष 2014 में आया था। जिन्होंने तब कैलाश की परिक्रमा की, वे आज भी उस अनुभव को अपने जीवन का सबसे बड़ा आशीर्वाद मानते हैं। अगला अश्व वर्ष 2038 में आएगा — तब तक कौन जाने कौन कहाँ होगा, शरीर में कितना बल शेष होगा, और परिस्थितियाँ कैसी होंगी।

2026 का अग्नि अश्व वर्ष अभी है, हमारे सामने है। यह न केवल तिब्बती परंपरा का पवित्र वर्ष है, अपितु हिंदू आस्था के लिए भी एक दिव्य मुहूर्त है। जब अश्व वर्ष, श्रावण मास, और भगवान शिव का पावन धाम — तीनों एक साथ आपके लिए उपस्थित हों, तो इस संयोग को व्यर्थ न जाने दें।

याद रखें: परिक्रमा का वास्तविक पुण्य केवल पैरों के चलने में नहीं, हृदय के भाव में है। जब आप कैलाश की परिक्रमा करते हैं, तो केवल पर्वत का चक्कर न लगाएँ — अपने अहंकार, अपने विकारों, और अपने पूर्वाग्रहों का भी चक्कर लगाएँ। तभी तेरह गुना पुण्य वास्तव में आपके जीवन में उतरेगा।

ॐ नमः शिवाय। कैलाश यात्रा मंगलमय हो।


अगला अश्व वर्ष: 2038। बारह वर्ष का इंतज़ार न करें — अभी तैयारी शुरू करें, अभी संकल्प लें।

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